हरिश्चन्द्र का चरित्र प्राचीन काल में ही नहीं वरन् वर्तमान में भी उतनी ही अहमियत रखता है। गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-“बचपन में मैंने बार-बार हरिश्चन्द्र का नाटक देखा, परन्तु नाटक देखने से तृप्ति नहीं होती थी। बार-बार उसे देखने को मन करता था। राजा हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता, कर्त्तव्यनिष्ठा ने मेरे जीवन को झकझोर कर रख दिया। मेरे जीवन पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा है। आज मेरी बुद्धि कहती है कि सम्भव है हरिश्चन्द्र कोई ऐतिहासिक व्यक्ति न हों, पर मेरे हृदय में तो हरिश्चन्द्र आज भी जीवित हैं। मैं मानता हूँ कि आज भी यदि मैं उस नाटक को पढूँ तो आँसू आए बिना न रहें।
"हरिश्चन्द्र जी की तरह महारानी शैव्या का चरित्र भी उतना ही प्रखर एवं प्रभावशाली है। वह उनसे कहीं भी उन्नीस प्रतीत नहीं होती पग-पग वह हरिश्चन्द्र जी का साथ ही नहीं देती बल्कि उन्हें उच्चा आदर्शो के प्रति प्रेरित भी करती हैं। वह एक आदर्श पत्नी थी। स्वप्न में पति द्वारा राज्य-त्याग की प्रतिज्ञा को उन्होंने न केवल स्वीकार किया वरन् उस प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए हरिश्चन्द्र जी को प्रेरित भी किया।शैव्या कहती हैं स्वामी! चिन्ता न किजीए । राज्य के प्रपंच में पड़कर मनुष्य भगवान को भुल जाता है; अब निश्चिन्त होकर हम भगवान का भजन करेंगे। जिसके लिए यह शरीर मिला है, उस उद्देश्य की वास्तविक सिद्धी होगी।
पति का अखण्ड प्रेम उसकी सेवा का सतत सौभाग्य है- यह पत्नी के लिए सबसे बड़ा सुख है। इसके विना तीनों लोकों का राज्य पाकर भी साधवी स्त्री सन्तुष्ट नहीं हो सकती है।" काशी में विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाने के अन्तिम दिन वह अपने आप को बेचने का सुझाव देती हैं। शैव्या कहती है, हे राजन्! सन्तानोत्पत्ति हेतु ही पत्नी की आवश्यकता होती है। मैंने एक संतान उत्पन्न की है। सज्जनों ने पुत्र को ही स्त्री का फल कहा है । मेरा अर्थ पूर्ण हो चूका है। अतः आप मुझे धन से बेचकर ब्राह्मण विश्वामित्र को दक्षिणा दे दीजिए।" वह पुनः कहती हैं," हे स्वामी! चिन्ता छोड़िये, अपने सत्य का पालन किजिये । सत्य का बहिष्कार करने वाला व्यक्ति श्मशान के सामान त्याज्य होता है |
अतः आप मुझे धन से बेचकर ब्राह्मण को दक्षिणा दे दीजिए ।" देवी भागवत में उन्होंने कहा, "स्वामी! मैने जो कुछ कहा है, वही किजीए, अन्यथा आपको शापाग्नि से दग्ध होकर प्राण त्यागना पड़ेगा । आप द्युत, मदिरा, राज्य अथवा भोग के लिए मुझे बेच नहीं रहे हैं, इन दुर्गुणों से तो आप कोसों दूर हैं । गुरु की दक्षिण चुकानी है, इसलिए बेच रहे हैं; अतः इसमें दुःख की क्या बात है, मुझे बेचकर अपने सत्यव्रत की रक्षा कीजिए।
" हरिश्चन्द्र से अलग होते समय शैव्या मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती है,"प्रभो! यदि मैने दान दिया हो, हवन किया हो तथा ब्राह्मणों को भोजन से तृप्त किया हो तो उस पुण्य के प्रभाव से मेरे स्वामी हरिश्चन्द्र मुझे फिर प्राप्त हों।" पति के लिए देवों को कोसने में भी पीछे नहीं रहती। शमशान घाट में अपने मृत पुत्र को देख कर 'मूर्छित हो जाते हैं, तो शैव्या हरिश्चन्द्र की दशा देखकर कहती है, "अत्यन्त कठोर, निर्मर्यादित, घृणित हे देव! तुम्हें धिक्कार है, कि तुमने अमर कीर्ति वाले इस राजा को चाण्डाल बना दिया। राज्यनाश, बन्धुओं का त्याग, पत्नी और पुत्र का विक्रय कराकर भी तुमने इसे नहीं छोड़ा।" पुत्र रोहिताश्च को मृत देखकर वह जिस प्रकार विलाप करती है, वह माँ की ममता और व्याकुलता का सटीक चित्रण है। शैव्या में एक आदर्श पत्नी, माँ, महिला, रानी तथा सेविका के समस्त गुण विद्यमान हैं। ऐसी सम्पूर्ण नारी भारतीय संस्कृति एवं साहित्य में दृष्टिगोचर नहीं होती।

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