राजा हरिश्चन्द्र पर विपत्ति | Story Part 1

राजा हरिश्चन्द्र सत्य की मूर्ति थे। समस्त प्रजा पूर्ण रुप से सुखी थी और सभी कार्य धर्मानुसार सम्पन्न होते थे। इन्होंने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया था । याचकों के माँगने पर उनकी माँग से पाँच गुना अधिक दान दिया। इसी कारण राजा हरिश्चन्द्र अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी और यशस्वी हुए। उनकी कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी। निष्काम होकर धर्मपूर्वक राज्य चलाने के कारण समस्त पृथ्वी पर उनका यशोगान था। उनकी यही कीर्ति उनकी विपत्ती का कारण बनी। एक बार इन्द्र के यहाँ एक सभा हुई, जिसका विषय था 'धर्म व सत्याचरण के आधार पर सतयुग और त्रेता युग की तुलना।' 

इस सभा में देवलोक के विद्वानों के अतिरिक्त अन्य लोकों के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया। अधिकतर विद्वानों का मत था कि सतयुग के लोग ज्यादा पवित्र एवं पुण्यात्मा थे और वे कभी अधर्म और असत्य का आश्रय नहीं लेते थे; जबकि त्रेतायुग में अधर्म का आचरण किया जाने लगा है तथा व्यक्ति असत्य बोलने लगे हैं । इस मत के विपरित अनेक ऋषि-मुनियों का कथन था कि त्रेतायुग में भी लोग धर्म का आचरण करते हैं और वे सत्य बोलते हैं; केवल कुछ लोग ही अपवित्र हो गए हैं और वे ही अधर्म तथा असत्य का आश्रय लेते हैं । इस बिन्दु पर इन्द्र की सभा वाद-विवाद होने लगा। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि इस पृथ्वी पर आज तक ऐसा कोई भी पैदा नहीं हुआ, जिसने जीवन में कभी भी झूठ बोला हो । 

परिस्थिति विपरित हो जाने पर बड़े से बड़ा धर्मात्मा भी सत्य के मार्ग विचलित हो जाता है । विश्वामित्र के कथन को सभी ने अपनी मूक सहमति प्रदान की, परन्तु उसी समय अयोध्या के कुलपुरोहित राजर्षि वशिष्ठ ने कहा-आज भी भूलोक में ऐसा व्यक्ति मौजूद है कि जो न तो कभी अधर्म का आश्रय लेता है और न ही किसी भी परिस्थिति में असत्य का सहारा लेता है सभा में सन्नाटा छा गया। विश्वामित्र ने तत्काल निर्णय लिया कि राजा हरिश्चन्द्र की अवश्य परीक्षा लेंगे। उनके इस निर्णय में इन्द्र, धर्म एवं अन्य देवताओं ने अपना सहयोग देने का आश्वासन दिया । राजा हरिश्चन्द्र की परीक्षा के सम्बन्ध में तीन कथाएँ प्रचलित हैं ।

प्रथम कथा- 

प्रथम कथा के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र 99 यज्ञ पूरे किये तो इन्द्र को यह भय सताने लगा कि 100 यज्ञ पूर्ण हो जाने पर राजा हरिश्चन्द्र देवलांक के सिंहासन के अधिकारी हो जायेंगे। अपना सिंहासन छिन जाने के भय से उन्होंने राजा हरिश्चन्द्र को सत्य के पथ से डिगाने का विचार किया। अपनी योजना में उन्होंने महर्षि विश्वामित्र, धर्म एवं अन्य कुछ देवताओं को सहभागी बनाया । एक रात्रि विश्वामित्र राजा हरिश्चन्द्र के स्वप्न में दिखायी दिये। उन्होंने हरिश्चन्द्र से कहा कि तेरी कीर्ति सारे संसार में है और तू दानी कहलाता है। मैं तुमसे दान में कुछ माँगने आया हूँ। क्या मेरी ईच्छा पूर्ण होगी?

राजा हरिश्चन्द्र के पूछने पर विश्वामित्र ने उनका राज्य दान में माँगा। हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में अपना राज्य उनको दे दिया। प्रातःकाल होते ही उन्होंने रानी शैव्या से अपने स्वप्न की बात कही। शैव्या ने उत्तर दिया-नाथ! आपने अपना राज्या दान में दिया है, चाहे स्वप्न में ही सही। आपको अपनी बात पर स्थिर रहना चाहिए। उसी समय विश्वामित्र दरबार में पधारते हैं और राजा हरिश्चन्द्र को उनके स्वप्न का स्मरण कराते हैं। हरिश्चन्द्र, तुरन्त ही अपना वचन पूरा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं । कुछ देर में राजा हरिश्चन्द्र, उनकी पत्नी शैव्या एवं पुत्र रोहिताश्च वल्कल वस्त्र पहनकर राजमहल से चलने के लिए तैयार हो जाते हैं।

उसी समय विश्वामित्र उनसे दान की दक्षिणा माँगते हैं । राजा महल के अन्दर जाकर दक्षिणा लाने के लिए जाते हैं, परन्तु विश्वामित्र कहते हैं कि अब इस राज्य की किसी भी वस्तु पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। हरिश्चन्द्र उनसे एक माह की मोहलत माँगते हैं और काशी की ओर चल देते हैं। रास्ते में रोहिताश्व को प्यास लगती है। थोड़ी ही दूर पर विश्वामित्र एक प्याऊ वाले ब्राह्मण का रूप धारण किये उनको मिलते हैं, परन्तु रोहिताश्व एवं शैव्या पानी पीने से यह कहकर इन्कार कर देते हैं कि अयोध्या की अब समस्त वस्तुएँ उनके लिए त्याज्य हैं, इसलिए वह यह पानी नहीं ग्रहण कर सकते। कुछ समय उपरान्त वह काशी पहुँच जाते हैं। धीरे-धीरे एक माह व्यतीत हो जाता है, परन्तु हरिश्चन्द्र दक्षिणा की राशि जुटाने में असमर्थ रहते हैं । 

30वें दिन विश्वामित्र हरिश्चन्द्र के सम्मुख उपस्थित हो जाते है और दक्षिणा की राशि माँगते हैं। राजा उनसे शाम तक का समय माँगते हैं। हरिश्चन्द्र और शैव्या अपने आप को बेचकर दक्षिणा की 60 भार राशि जुटाने का निर्णय लेते हैं । लिए गए निर्णय के अनुसार शैव्या और स्वयं को बेचने के लिए काशी के बाजार में बोली लगाते हैं। ब्राह्मण रामलाल 20 भार में शैव्या को दासी के रुप में खरीद लेता है। माता के संग जाने के लिए रोहिताश्व के जिद्द करने पर वह उसको भी 10 भारत में खरीदलेता है । कालू नाम का डोम हरिश्चन्द्र को श्मशान घाट की रखवाली करने के लिए 30 भार में खरीद लेता है। विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाने के उपरान्त हरिश्चन्द्र कालू डोम के मरघट की रखवाली के लिए चल देते हैं। मरघट के सभी नियम समझाने के बाद कालू डोम उनसे कहता है कि अन्त्योष्टि का कर लिए बिना किसी को भी अन्त्येष्टि न करने दी जाये। इसके उपरान्त विश्वामित्र हरिया बने राजा हरिश्चन्द्र तथा तारा बनी शैव्या को अनेक प्रकार से परीक्षा लेते हैं। 

एक दिन ब्राह्मण रामलाल की पत्नी रोहित को फूलों की बगिया में जाकर फूल लाने के लिए कहती है। फूल तोड़ते समय एक सर्प रोहिताश्व को डस लेता है। कुछ देर उपरान्त रोहित की मृत्यु हो जाती है। विलाप करती हुई तारामती उसके पास पहुँचती है और अंधेरी रात में रोहित को उठाकर उसकी अन्तिम क्रिया के लिए श्मशान घाट ले जाती है । श्मशान घाट पर प्रारम्भ में हरिश्चन्द्र और तारामती एक दूसरे को पहचान नहीं पाते रोहित की अन्तिम क्रिया का कर माँगते हैं। तारामती विलाप करते हुए बताती है कि उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है। कर के रुप वह तारामती से उसकी फटी हुई साड़ी का टुकड़ा माँगते हैं। उसी समय आकाश से बिजली गरजती है, दोनो एक-दूसरे को पहचान लेते हैं, परन्तु राजा हरिश्चन्द्र अपने स्वामी कालू डोम की आज्ञा के अनुरुप बिना कर लिये रोहित की अन्तिम क्रिया नहीं करने देते। 

अन्त में विवश होकर तारामती कर के रुप में अपनी साड़ी का आधा हिस्सा फाड़ने लगती है, जैसे ही साड़ी फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है, वैसे ही सम्पूर्ण वातावरण तेज प्रकाश से चमक जाता है । आकाश से पुष्यों की वर्षा होने लगती है और राजा हरिश्चन्द्र की जय-जयकार करते हुए इन्द्र, धर्मराज, अन्य देवता तथा विश्वामित्र श्मशान में प्रगट हो जाते हैं। धर्मराज बोले हे राजन! ये साक्षात ब्रह्मा हैं, ये स्वयं भगवान और साध्यगण हैं, ये देवेन्द्र, विश्वेदेवा, मरुद्गण, चारणों सहित सब लोकपाल हैं, ये नाग, सिद्ध, गन्धर्वों सहित रुद्र और अश्विनी युगल हैं तथा ये अन्य देवता हैं। विश्वामित्र की तरफ इशारा करते हुए बोले-ये विश्वामित्र हैं, इन्होंने ही तुम्हारी परीक्षा ली थी, ये तुमसे मित्रता करना चाहते हैं और तुम्हारा ईष्ट करना चाहते हैं। 

इसके पश्चात् धर्म, इन्द्र और विश्वामित्र राजा हरिश्चन्द्र के पास आये। धर्मराज बोले-मैं साक्षात् धर्म तुम्हारे सत्य सहिष्णुता और इन्द्रिय निग्रह आदि गुणों से सन्तुष्ट होकर तुम्हारे पास आया हूँ। इन्द्र बोले-हे राजा हरिश्चन्द्र! तुम परीक्षा में खरे उतरे । तुमने अपने पुत्र एवं पत्नी के साथ समस्त सनातन लोंको को जीत लिया है । अतः हे राजन् ! तुम अपनी पत्नी और पुत्र के साथ स्व्गारोहण करो। यह कहकर इन्द्र ने अमृत की वर्षा की। उस वर्षा से रोहिताश्च न केवल जीवित हो गये, अपितु पूर्ण स्वस्थ और प्रसन्नचित भी हो गए। राजा हरिश्चन्द्र से इन्द्र ने स्वर्गधाम चलने के लिए कहा। हरिश्चन्द्र ने तत्काल उत्तर दिया हे देवराज! 

स्वामी चण्डाल से आज्ञा लिये बिना मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा । धर्मराज बोले-चाण्डाल कोई और नहीं, मैं ही था। इन्द्र ने कहा-हे हरिश्चन्द्र ।। पृथ्वी के समस्त मनुष्यों द्वारा जिस स्थान की सदैव अभिलाषा की जाती है, पुण्यात्मा मनुष्य के उस स्थान पर तुम आरोहण करों । हरिश्चन्द्र बोले- कोशलवाशी सभी मेरे वियोग में दुःखी हैं। अतः उनको छोड़का मैं स्वर्ग कैसे जा सकता हूँ? यदि मैं ऐसा करूंगा तो महापाप का भागी होऊँगा, क्योंकि ब्राह्मण, गुरु तथा स्त्री वध की भाँति भक्तों का त्याग भी महापाप है। यदि मेरी प्रजा मेरे साथ स्वर्ग जा सके तो मैं स्वर्ग जाऊँगा, अन्यथा मैं साथ नरक में ही रहुँगा रोहिताश्च के राज्याभिषेक के उपरान्त हरिश्चन्द्र अपनी प्रजा के साथ स्वर्गलोक चले गए। 

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