हरिश्चन्द्र और महारानी शैव्या का चरित्र

उपरोक्त कथाओं के आधार पर राजा हरिश्चन्द्र और महारानी शैव्या ऐसे रित्र के रुप में उभकर सामने आते हैं, जिसकी तुलना भारतीय धर्म और संस्कृति में अन्य किसी से नहीं की जा सकती | राजा हरिश्चन्द्र एक दानवीर, त्यागी, परोपकारी, क्षमाशील, सहिष्णु, कर्तव्यनिष्ठ, धर्मपरायण, धैर्यवान और दृढ़प्रतिज्ञ के रूप में तो विश्व के सम्मुख उभरते ही हैं, इन सबसे ऊपर उनकी ख्याति एक सत्यनिष्ठ के रुप में सामने आती है। 

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार डोम कालसेन ( कालू डोम) स्वयं साक्षात् धर्मराज ही थे, जो हरिश्चन्द्र की परीक्षा लेने के लिए डोम बने थे । कुछ ग्रन्थों में काल सेन का नाम प्रविर भी मिलता है । वायुपुराण (88.118 ) के अनुसार हरिश्चन्द्र ने राजा होते हुए भी मात्र अपने वचनों का पालन करने के लिए अनेक कष्ट सहे, परन्तु अपने व्रत से नहीं डिगे । अन्त में परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। महर्षि वशिष्ठ उनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं-"मेरे 100 पुत्रों को विश्वामित्र ने मार डाला, तब भी मुझे इतना क्रोध नहीं आया, जितना कि देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करने वाला, धर्मात्मा, निर्दोष, अप्रमत्त, प्रसन्स (वंदन) हैं ।" महर्षि विश्वामित्र के प्रश्नों का उत्तर देते हुए राजा हरिश्चन्द्र कहते हैं-"धर्मज्ञ राजा को श्रेष्ट ब्राह्मणों, निर्धनता एवं दीनों और जिनकी जीविका नष्ट हो गई है, (ऐसे व्यक्तियों) को दान देना चाहिए। भयभीत प्रजा की रक्षा करनी चाहिए तथा धनुष उठाकर धर्मशास्त्र का अनुसरण करते हुए आतताइयों एवं शत्रुओं के साथ सदैव युद्ध करना चाहिए।

" वे विश्वामित्र से कहते हैं-'" भगवन् यह मेरा धर्म था । प्रभो! इसे आप मेरा अपराध न मानें । हे। मुने! अपने धर्म की रक्षा में रत मोक्ष राजा पर आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।" इन्द्र के यह कहने पर " हे महाभाग! अपने श्रेष्ट कर्मों के फलस्वरूप तुम अपने पुत्र एवं पत्नी सहित सद्गति प्राप्त करोगे", हरिश्चन्द्र अपनी कर्त्तव्यपरायणता एवं स्वामी भक्ती का इससे बढ़कर क्या प्रमाण दे सकते हैं-" हे देवराज! अपने स्वामी चाण्डाल से आज्ञा लिए बिना मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा।" 

प्रजा के प्रति प्रेम एवं कर्त्तव्य की झलक हरिश्चन्द्र के इन शब्दों से स्पष्ट हो जाती है- "हे देवराज! आपको नमस्कार है। आप कृपया मेरी इस बात को ध्यानपूर्वक सुनिये, जो मैं आपसे विनीत भाव से कह रहा हूँ। कोशलवासी सभी मेरे वियोग में दुःखी हैं। अतः उनको छोड़कर मैं स्वर्ग कैसे जा सकता हूँ।? यदि मैं ऐसा करुँगा तो महापाप का भागी हो जाऊँगा, क्योंकि ब्राह्मण, गुरु तथा स्त्री वा की भाँति भक्तों का त्याग भी महापाप हैं यदि मेरी समस्त प्रजा मेरे साथ स्वर्ग जा सके तो मैं स्वर्ग जाऊँगा, अन्यथा मैं उनके साथ नरक में ही रहूँगा । 

हे देवेन्द्र! कुटूम्बियों, परिजनों एवं प्रजाजनों के सहयोग से ही राजा बड़े-बड़े यज्ञों तथा अन्य कार्यों की पूर्ति करता है । अतः मेरे जप, यज्ञ एवं दानादि सत्कर्म केवल मेरे न होकर मेरी समस्त प्रजा के यदि इन कर्मों का फल स्वर्ग प्राप्त है तो स्वर्ग का भोग भी मैं अपनी समस्त प्रजा साथ करना चाहूँगा, भले ही वह केवल एक दिन का हो।

" दैत्य शुक्राचार्य उनकी कीर्ति का इस प्रकार बखान करते हैं- "हरिश्चन्द्र के सामान कोई राजा न तो हुआ है और न ही होगा। अतः जो व्यक्ति हरिश्चन्द्र की इस कथा का निरन्तर भक्ति भाव से श्रवण करेगा, वह वेद, पुराण तथा सभी तन्त्रों के फल को प्राप्त करेगा एवं विभिन्न तीर्थों के फल भी प्राप्त कर लेगा।

" हिन्दी साहित्य के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उनकी सत्यनिष्ठा के विषय में निम्न विचार व्यक्त किए हैं

चन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार । 

पै दृढ़ श्री हरिश्चन्द्र को, टरै न सत्य विचार ॥



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