सिप्तदीपेश्वर हरिश्चन्द्र और वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट



राजा हरिश्चन्द्र का शासनकाल भारतीय साहित्य, संस्कृति एवं पौराणिक इतिहास का स्वर्णयुग था वह अत्यन्त बलवान् तथा भूपालों के स्वामी थे। भूमण्डल के सभी नरेश इनकी आज्ञा का पालन सिर झुकाकर करते थे । यह ससम्मान इन्द्र की सभा में विराजते थे । इन्होंने अपने एकमात्र जैत्ररथ पर चढ़कर अपने शौर्य और अस्त्रों-शस्त्रों के प्रताप से सातों द्वीप पर विजय प्राप्त की थी, इसी कारण इन्हें सप्तद्वीपेश्वर कहा गया है। (विष्णुपुराण में इसकी चर्चा है।)

स्कन्द पुराण काशी खण्ड में दिये गये विवरण के अनुसार कालसेन डोम के यहाँ श्मशान पर कार्य करते समय हरिश्चन्द्र ने श्मशान घाट पर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। भगवान शिव ने वहाँ प्रकट होकर कहा-हरिश्चन्द्र! तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा। यह शिवलिंग विश्व का ऐसा शिवलिंग होगा जिसके एक भाग में मैं तथा दूसरे भाग में अर्द्ध हरिश्चन्द्रेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध होगा। 

डोम का रुप धारण करने वाले धर्मराज ने भी श्मशान घाट पर शिवलिंग स्थापित किया था। विवरण के अनुसार, उसी स्थान पर था, जहाँ महारानी शैव्या अपने पुत्र रोहिताश्व का शव लेकर अन्त्येष्टि के लिए आई थीं। यह शिवलिंग यम धर्मेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ । वाराणसी में संकठा घाट मन्दिर से थोड़ी दूर चलने पर सीढ़ी घाट उतरते ही ठीक गंगा के तट पर बायें हाथ पर एक छोटा सा मन्दिर है, जिसमें यम धर्मेश्वर महादेव स्थापित हैं । मन्दिर की उपस्थिति से यह सिद्ध होता है कि राजा हरिश्चन्द्र के समय इसी स्थान पर श्मशान घाट थ|, जहाँ हरिश्चन्द्र ने शैव्यया से रोहिताश्व की अन्तयेष्टि के लिए कर माँगा था। वाराणसी का हरिश्चन्द्र घाट वर्तमान में हरिश्चन्द्र जी के नाम से जाना जाता है।

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